होली का महत्व [Importance of Holi]

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 हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के परिवर्तन और संक्रांति अवस्था से बचने के उपाय के तौर पर अनेक त्यौहार और पर्व विकसित किए हैं।

 इन्हीं में एक होली का पर्व है।

 

 होली के दिन हम रात्रि में होलिका दहन करते हैं आजकल यह दहन लकड़ियों को जलाकर किया जाता है जो कि परंपराओं का विकृत स्वरूप है। होलिका दहन हमेशा से गाय के गोबर के कंडो पर किया जाता था और इन कंडो में पिछले ऋतु ठंड से बचे हुए अतिरिक्त सामग्रियों को दहन करके अर्थात गन्ध चिकित्सा लेने के लिए दहन किया जाता था।

 इसके  साथ घी (घृत) की आहुति दी जाती थी।

यह कार्य ग्राम के बाहर सामूहिक होती थी जिससे पूरा गांव शुद्ध और पवित्र हो जाता था।

 

 कैसे ????

 

को समझे

 

 गाय के गोबर में इन्डॉल, फिनॉल और फॉर्मेलिन होता है। 

प्रकृति के नियम के अनुसार जो भी तत्व जलता है जलने पर वह सूक्ष्म होकर ऊपर आता है जैसे कार्बन जलेगा तो कार्बन सूक्ष्म होकर हवा में आकर ऑक्सीजन के साथ संघनन करके कार्बन डाइऑक्साइड बनाएगा, फास्फोरस जलेगा तो फास्फोरस ऑक्साइड हवा में बनाएगा। भूमि का कोई भी तत्व हवा में आकर ऑक्सीजन के साथ तुरंत युग्म बनाता है और वह तत्व ऑक्साइड के रूप में आ जाता है हमारा खून किसी भी तत्व को ऑक्साइड के रूप में ही ग्रहण करता है आधुनिक वैज्ञानिक इस तरह के तत्व को मनुष्य के लिए अवेलेबल फॉर्म में अर्थात ग्रहण करने लायक कहते हैं,अब कंडे में जो इंडोल, फिनॉल और फॉर्मलीन होता है वह जलकर इण्डोलऑक्साइड फॉर्मलीन ऑक्साइड बनाता है,जो पर्यावरण को शुद्ध करता है।

 कुछ विद्वान कहते हैं की गाय के गोबर का कार्बन जलेगा तो कार्बन डाइऑक्साइड ही निकलेगा। 

लेकिन  गाय के गोबर से बने कंडे पर प्रकृति का यह नियम लागू नही होता। निसंदेह गाय का गोबर कार्बन से बना है और पूरा का पूरा कार्बन ही है इसकी जांच करेंगे इसमें कार्बन ही कार्बन निकलेगा पर जब कंडा जलता है तो कोई भी  कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलता इसका प्रमाण मैं इस तरह से देता हूं कि गाय के गोबर का कंडा छोड़कर जब भी कोई गोबर या लकड़ी का कार्बन जलाता है तो हमारे आँख से आंसू आते है और सांस लेने में परेशानी होती है, आंखों में जलन भी होती है पर गाय के गोबर के कंडे के जलने पर उक्त किसी भी तरह की कोई भी समस्या नहीं होती इससे यह साबित होता है कि गाय का गोबर का कार्बन जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित नहीं होता है इसीलिए होलिका दहन हमें केवल और केवल गाय के गोबर के कंडो से होलिका जलाना चाहिए। गाय के गोबर के कंडो को जलाने के पीछे एक और कारण है पिछले वर्ष के बचे हुए जो भी कंडे है हवा पानी लगने से फंगस लगने से उनको होलिका दहन में एक साथ सबको इकट्ठा कर के जलाना जरूरी है क्योंकि अब नए कंडे बनाने का समय शुरू हो जाता है, तो हमें पुराने कंडे जलाकर नए कंडे बनाने ही चाहिए।

अब इन गाय के गोबर के कंडों के ढेर पर घी डालने का तात्पर्य समझे जैसे ही कंडों के लाल अलाव पर आप घी डालेंगे तो घी में पाए जाने वाले 11 सेचुरेटेड एसिड्स गैस के रूप में हवा में आते हैं उनके आने से बहुत तरह की गैसे निकलती है पर इनमें से 5 गैस वैज्ञानिकों द्वारा देखी गई 

 

पहला-एथिलीन ऑक्साइड जो हमारे शरीर के तापमान को संतुलित करती है ठंड और बरसात के समय में हमारा शरीर कफ प्रकृति का हो जाता है इस प्रकृति को यह गैस समाप्त करके हमारे शरीर को पुनः कफज प्रकृति से निकाल कर और गर्मी के तेज से बचाने के लिए सक्षम करती है,इस गैस से केले पकाने के अपने प्रयोग आपने अपने यूट्यूब चैनल पर देखा ही होगा।

 

 दूसरी गैस प्रापलीन ऑक्साइड है यह गैस वायु को शुद्ध और सजीव करती है और वायु में सूर्य के तेज का प्रभाव कम हो ऐसा वायु को बनाती है।

 

तीसरी गैस बीटा प्रापियो ऑक्साइड है जो हमारे शरीर में सभी तरह के विटामिंस और एसिडस के निर्माण में सहायक बनती है।

 

 चौथी गैस फॉर्मेलिन ऑक्साइड है जो भूमि वायु और जल में पाए जाने वाले हानिकारक वायरस फंगस और बैक्टीरिया ग्रोथ को रोकती है और इन तीन तत्वों को शुद्ध व सजीव करती है।

 

पांचवीं गैस ऑक्सीजन निकलती है जो सबको जीवन देती है।

 

 ज्वार, बाजरा,तिल एवं विभिन्न प्रकार के औषधीय जड़ी,बूटिया आदि सामग्री डालने से इनके अंदर के रसायन भी सूक्ष्म रूप में निकलते हैं जो पूरे गांव को वायु के कण के रूप में  न्यूट्रीशन व सुगन्ध प्रदान करते हैं शायद गांव की बाहर मुहाने में यह होलिका दहन करने की परंपरा इन्हीं कारणों से थी ताकि इन से निकली हुई गैस पूरे गांव को लाभान्वित कर सके 

पूरे गाँव का वातावरण *सुगन्धिम पुष्टि वर्धनम* हो सके।

 

अब मैं इस पर्व की आगे की अन्य परंपराओं पर चर्चा करूंगा होली का भस्म दूसरे दिन सुबह ग्रामवासी उठाकर घरों में लेकर आते हैं और अपने सगे संबंधियों परिजनों  के शरीर में यह भस्म मलते है,इसके पीछे का तात्पर्य है कि यह भस्म एंटीबैक्टीरियल एंटीफंगल और एंटीवायरल होता है मानव शरीर के समस्त चर्म रोगों को समाप्त करने की शक्ति रखता है और मानव शरीर के  चमड़ी में होने वाले रंध्र (सूक्ष्म छेद) को खोल देता है इन्हीं रन्ध्रों से हमारी चमड़ी बाहर के ताप और हवामान को ग्रहण करता है और पसीना निकालने के लिए  का उपयोग करता है।

 

अपने जैविक जीवन शैली विज्ञान  मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ हर्षद पण्डित जी ने इस भस्म पर अनेक प्रयोग किये है व अनेक अनुभव लिए है।

 

 वर्ष में एक बार इस भस्म को हमारे शरीर में अच्छे से लगा लेने से शरीर के अंदर की नकारात्मक उर्जा भी समाप्त होती है मैंने अपने स्वयं के प्रयोग से नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से लोगो को बचते देखा है।

 

🌻 रंगो का महत्व🌻 

होली में एक दूसरे के ऊपर रंग भी डाले जाते थे पर यह प्राकृतिक रंग थे यह रंग इस समय आने वाले अनेक तरह के फूलों से बनाए जाते थे पलाश के फूल सेमल के फूल आदि अनेक फुल इस समय दिखाई देते हैं इन फूलों को गर्म पानी में डालकर इनका रंग या अर्क निकालकर एक दूसरे के ऊपर डाला जाता था यह रंग मनुष्य के शरीर को ऊर्जा से भर देता था और आने वाले समय में गर्मी से होने वाले दुष्प्रभाव को बचाने के लिए सक्षम होता था अभी हम केमिकल रंग लगाने लगे हैं जो अनेक तरह से घातक हैं,यह हमारी परंपरा का दोष हैं,हमें टेशू (पलास) के फूलों से रंग निकालकर होली खेलकर इस दोष को दूर करना होगा।

 

गुलाल का महत्व

इस समय में सिंदूर के पौधे में भी सिंदूर के फूल खिलकर पक चुके हैं इन पके हुए बीजों के अंदर सिंदूर पराग सूख चुकी है, इस पराग को  पानी में घोलकर इसमें सिंघाड़े का आटा मिलाकर सिंदूर  गुलाल बनाया जाता था जिसे मस्तक में लगाने से तुरंत हमारा शरीर का तापमान कम हो जाता है, इस परंपरा के पीछे यह मकसद था की होली के बाद हम एक दूसरे के माथे पर या अपने माथे पर इस गुलाल को लगाएं और गर्मी के लू से अपने शरीर को बचाएं,सिंदूर का पराग माथे में लगाते ही  हमारे शरीर में आपसे अप्रत्याशित तरीके से तापमान घट जाता है हमारा मन बहुत शांत  हो जाता है हमारा मन आनंद से भर जाता है शायद माथे में गुलाल लगाने के लिए ही यह परंपरा इसी विज्ञान के लिए बनाया गया था।  जैविक जीवन शैली विज्ञान  मिशन इस परंपरा को शुद्ध रूप में वैज्ञानिक रूप में पुनः स्थापित करने के लिए कटिबद्ध है।

 

 

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